हिस्ट्री टॉपर थी-बन गई आर्टिस्ट: प्रिंसिपल बोली थी-कलाकार बनोगी तो गुस्सा आया था, भारत के 18 राज्य रंगने के बाद अमेरिका में सिखा रही कलाकारी

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नई दिल्ली20 मिनट पहलेलेखक: भारती द्विवेदी

एक लड़की जिसकी दिलचस्पी दिन और तारीखों में थी। उस लड़की को इतिहास पढ़ना, जानना अच्छा लगता था। वो दिनभर किताबों में डूबी रहती थी क्योंकि उसे प्रोफेसर बनना था। लेकिन अब उसके हाथों में किताब-कलम की जगह पेंटिंग ब्रश और रंग है। आज वो रंग ही नहीं बेकार समझी जाने वाली किसी भी चीज से आर्ट बना सकती है। उस लड़की को दुनिया ‘आर्टिस्ट मीनाक्षी जे’ या ‘मी जे’ के नाम से जानती है।

हाल ही में मी को उनके काम के लिए ‘सेंट लुईस विजिनरी इमर्जिंग आर्टिस्ट अवॉर्ड’ दिया गया है। आज ‘ये मैं हूं’ में वुमन भास्कर से अपनी कहानी साझा कर रही हैं मी जे। उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी…

स्ट्रेस से बचने के लिए जो मन में आया कागज पर उकेरा

मेरा जन्म बिहार में हुआ है। सातवीं तक की पढ़ाई बिहार के स्कूल से ही की। उसके बाद मैं दिल्ली आ गई और आगे की पढ़ाई ब्लू बेल्स इंटरनेशनल स्कूल से पूरी की। फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री ऑनर्स और जेएनयू से हिस्ट्री में एमए किया। अंबडेकर यूनिवर्सिटी से स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज से एमफिल किया। इस दौरान मेरी रिसर्च उत्तर भारत के पेंटर्स और ट्रेडिशनल मधुबनी पेंटिंग पर रही। फिर साल 2019 में अमेरिका के वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी से फुल स्कॉलरशिप पर मास्टर्स ऑफ फाइन ऑर्ट्स की पढ़ाई पूरी की।

अमेरिका में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मी वहीं पर आर्टवर्क का काम कर रही हैं। साथ ही वर्कशॉप में बतौर जूरी और गेस्ट लेक्चर अपना एक्सपीरियंस शेयर करती हैं।

दसवीं के पहले मैं स्पोर्ट्स में काफी एक्टिव थी लेकिन बोर्ड एग्जाम की वजह से मैंने सब छोड़ दिया। अपना सारा ध्यान पढ़ाई की तरफ लगा दिया। कुछ दिन बाद मुझे एहसास हुआ कि पढ़ाई मेरे लिए काफी स्ट्रेसफुल होती जा रही है। मैंने ध्यान भटकाने के लिए ड्रॉइंग करना शुरू किया। मैंने दसवीं-बारहवीं में पढ़ाई के अलावा फुल स्केल पेपर पर खूब ड्रॉइंग की। मैं पेपर उठाती और जो मन में आता उस पर उकेर देती। उन पेंटिंग्स में मधुबनी पेंटिंग के अलावा और भी बहुत सारे डिजाइन होते थे।

प्रिंसिपल ने कहा था आर्टिस्ट बनोगी, मैं नाराज हो गई थी

आर्ट में मेरी दिलचस्पी थी लेकिन आर्ट कभी मेरा विषय नहीं था। मैं इकोनॉमिक्स, हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस में अच्छी थी। मैं हिस्ट्री में सीबीएसई की टॉपर रही हूं। मैं हमेशा ही एकेडमिक्स में जाना चाहती थी। स्कूल में एक ट्राइबल पेंटिंग की किताब मिली थी, जो मुझे पसंद थी। मेरी राइटिंग अच्छी थी, इस वजह से मैं लाइन वर्क करती थी। लेकिन पता नहीं क्यों मेरी प्रिंसिपल को मेरी पेंटिंग बहुत अच्छी लगती थी। स्कूल के एनुअल फंक्शन में हर गेस्ट को मेरी पेंटिंग गिफ्ट की जाती थी। जो कि मुझे बहुत अजीब लगता था। एक बार उन्होंने कहा था कि मैं चाहती हूं कि तुम भविष्य में बहुत फेमस आर्टिस्ट बनो। ये सुनकर मुझे गुस्सा आ गया था। मैं सोच रही थी कि मैं हिस्ट्री की टॉपर हूं, ये मुझे क्या कह रही हैं। मुझे लगा रहा था कि ये कितनी बेइज्जती की बात है।

एंट्रेस टॉपर थी फिर भी मुझे JNU में एडमिशन नहीं मिला

साल 2010 में मेरे एमए पूरा हुआ। एमए के आखिरी साल में मेरी पढ़ाई बहुत डिस्टर्ब रही। मैंने शादी कर ली थी। मेरे पिता जी आईसीयू में थे। उनके बचने की उम्मीद कम थी। मैंने जेएनयू में एमफिल के लिए रिटन एग्जाम दिया और मैं पांचवीं टॉपर थी। लेकिन इसके बाद भी मुझे एडमिशन नहीं मिला। एमफिल में मैं हिस्ट्री के बजाए एंथ्रोपोलॉजिकल (मानवशास्त्र) लेना चाहती थी। लेकिन मुझे एडमिशन नहीं मिला। मुझे पता चला कि इसकी वजह मेरी शादी थी। एक प्रोफेसर ने मुझसे कहा कि हमें लगा कि तुम्हारी शादी हो गई है, तुम्हारी रिसर्च में दिलचस्पी नहीं होगी। ये मेरे लिए काफी सदमे जैसा था। उनका कमेंट मेरे लिए काफी अपमानजनक था। ये मेरी पूरी एकेडमिक्स जर्नी का अपमान था।

मी और जे ने साल 2017 में I in Togetheness नाम से एक सीरीज शुरू की थी। इस सीरीज में उन्होंने 52 हफ्ते तक 52 फोटो के जरिए बतौर कपल अपनी जर्नी को दर्शाया था।

मी और जे ने साल 2017 में I in Togetheness नाम से एक सीरीज शुरू की थी। इस सीरीज में उन्होंने 52 हफ्ते तक 52 फोटो के जरिए बतौर कपल अपनी जर्नी को दर्शाया था।

पति की सलाह पर मैंने पेंटिंग की शुरुआत की

जेएनयू में एडमिशन ना होना मेरे जीवन के लिए काफी दुखद था। 2010-2012 के बीच मैं काफी रोई और परेशान रही। मैंने पढ़ाई से ब्रेक ले लिया था। मैंने कभी जेएनयू के इतर नहीं सोचा था। मैं सिर्फ प्रोफेसर बनाना चाहती थी। मुझे नहीं पता था कि अब मैं क्या करूंगी। फिर एक दिन मेरे पति जे ने मुझसे कहा कि तुम पेंटिंग क्यों नहीं करती हो? मुझे लगा ये सिर्फ टाइम की बर्बादी होगी और कुछ नहीं। लेकिन फिर थोड़े टाइम के बाद मैंने पेंटिंग करना शुरू किया। मैं घंटों-घंटों पेंटिंग करती रहती थी। इस वजह से मेरे हाथ के अंगूठे के टिश्यू में फ्रैक्चर आ गया था। जब डॉक्टर के पास गए तो बड़ा ही फनी सा वाकया हुआ। डॉक्टर को लगा कि ये पेंटिंग की वजह से नहीं बल्कि घरेलू हिंसा की वजह से हुआ है।

पहली सोलो एग्जीबिशन मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी

मैं ट्रेडिशनल मधुबनी पेंटिग नहीं बनाती थी। मैं मधुबनी पेंटिंग के कचनी स्टाइल में काम करती थी। मेरी पेंटिंग एक्सपेरिमेंटल होती थी। एक साल के अंदर मैंने 12-13 पेंटिंग बनाई थी। फिर एक दोस्त ने सलाह दी कि तुम्हारी पेंटिंग बहुत अच्छी है, इन्हें आर्ट गैलरी एग्जीबिशन में ले जाओ। मुझे उस समय तक कुछ भी आइडिया नहीं था कि कैसे फ्रेम करना है, आर्ट गैलरी तक कैसे पहुंचना है। लेकिन तमाम भागदौड़ के बाद साल 2012 में मेरी पेंटिंग की पहली सोलो एग्जीबिशन लगी। पेंटिंग की थीम​​ ‘मिथ रिइंटरप्रेटेशन’ थी। उद्घाटन करने आए नामी कवि अशोक वाजपेयी। सोलो एग्जीबिशन किसी भी आर्टिस्ट के लिए बहुत बड़ी बात होती है। अशोक जी को मेरी पेंटिंग बहुत अच्छी लगी थी।

मी कहती हैं- 'जेएनयू से मेरा मजबूत रिश्ता रहा है। मेरे पिता, दो चाचा, मेरे पति और मैं सब जेएनयू से पढ़े हैं।'

मी कहती हैं- ‘जेएनयू से मेरा मजबूत रिश्ता रहा है। मेरे पिता, दो चाचा, मेरे पति और मैं सब जेएनयू से पढ़े हैं।’

पेंटिंग का प्रोफेशनलिज्म नामी पेंटर एसएच रज़ा ने सिखाया

एक दिन अशोक जी ने बातों-बातों में मशहूर पेंटर एसएच रज़ा का जिक्र किया था। मैंने उनसे कहा कि ‘काश मैं उन्हें देख पाती।’ अशोक जी मुझे रज़ा के पास ले गए और मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो मेरे सामने बैठे हैं। रज़ा ने एक-एक करके मेरी सारी पेंटिंग देखी। फिर उन्हें जो पेंटिंग पंसद आई, उस लेकर कहा कि इसमें आपका नाम नहीं है। मैंने उनसे कहा कि मैं नाम नहीं लिखती हूं। उन्होंने कहा कि फिर तो ये बड़ा ही अनप्रोफेशनल तरीका है। मैं कैसे यकीन करूं कि ये पेंटिंग आपने बनाई है? अगर मैंने इसे खरीदा और कल को कोई और खरीदना चाहे तो मैंने कैसे बताऊंगा कि ये आपकी पेंटिंग है? फिर उन्होंने मुझसे कहा कि आप इस पेंटिंग को कितने में बेचेंगी? मैं रोने लगी थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि एक हफ्ते पहले मेरी सोलो एग्जीबिशन हुई और अब एसएच रज़ा मेरी पेंटिंग खरीदना चाहते थे।

मधुबनी आर्ट के बारे में मी का कहना है कि उन्हें पहली बार अपनी चाची के जरिए इसके बारे में पता चला। उस वक्त उनकी उम्र पंद्रह साल रही होगी।

मधुबनी आर्ट के बारे में मी का कहना है कि उन्हें पहली बार अपनी चाची के जरिए इसके बारे में पता चला। उस वक्त उनकी उम्र पंद्रह साल रही होगी।

मैंने उनसे कहा कि दाम तो मैंने सोचा ही नहीं है। फिर मैंने उन्हें वो पेंटिंग गिफ्ट में दी, बदले में उन्होंने मुझे एक किताब गिफ्ट की।

इफ्को वालों से चिढ़कर पेंटिंग का दाम 1 लाख बता दिया था

मैंने कभी अपनी आर्ट को बेचने का नहीं सोचा था। मैं कभी इसके लिए तैयार नहीं थी। एक बार इफ्को से चार-पांच लोग पेंटिंग देखने घर आए। तीन घंटे तक उन्होंने मुझसे सवाल-जवाब किए। मैं उनके सवाल से परेशान हो गई थी। मुझे लगा रहा था कि कब ये मेरे घर से जाएंगे। उन्हें मेरी एक पेंटिंग बहुत पंसद आई थी। वो उनकी थीम के साथ मैच कर रही थी। उन्होंने मेरी सबसे बेहतरीन पेंटिंग का दाम पूछा, मैंने गुस्से में कहा दिया एक लाख दस हजार। एक और पेंटिंग थी, जिसे मैं सबसे बेकार मान रही थी। शायद मैं उसे फेंक भी देती। उसका दाम भी उन्होंने पूछा तो मैंने 70 हजार बोल दिया। फिर वो चले गए। मुझे लगा रहा था कि मैंने बहुत मंहगा बता दिया है, अब वो नहीं खरीदेंगे। लेकिन मुझे कॉल आया कि आप अपनी दोनों पेंटिंग लेकर ऑफिस आ जाइए। जब मैं अपना पहला कॉमर्शियल चेक ले रही थी, तब उनके आर्ट डिपार्टमेंट के हेड ने मुझसे कहा कि मीनाक्षी जी एक बात बोलूंगा, आपने कीमत बहुत कम लगाई। आप अगर तीन गुना दाम भी बताती तब भी हम इसे खरीद लेते।

‘बेटी दिवस’ पर जब कतरन से बनाई लड़की

साल 2016 में ‘बेटी दिवस’ के मौके पर राजस्थान सरकार की तरफ से मुझे सम्मानित किया जाना था। जब मैं और जे (मेरे पति) जवाहर कला केंद्र पहुंचे तो, जे का कहना था कि यहां तुम्हें सम्मान तो मिल रहा है। लेकिन लोगों को क्या याद रहेगा कि तुम क्या करती हो। तुम्हें मौका मिला है, तो कुछ क्रिएट करो। फिर मैं वहां के आसपास के दर्जी के पास गई। वहां से मैंने कतरन से भरे दो बोरे उठाए और रोड पर घसीटते हुए सेंटर पहुंची। फिर मैंने उन सारी कतरन को मिलाकर 10×10 के कैनवास पर नमस्ते करते हुए एक लड़की बनाई। मेरे उस काम में वहां मौजूद लोगों ने भी काफी मदद की थी और उस पूरी प्रोसेस को ऑडिटोरियम में बैठे लोगों को प्रोजेक्टर पर दिखाया जा रहा था।

घर पर प्रेग्रेंट वुमन होती थी और फील्ड में बस आर्टिस्ट

साल 2017 में साहित्य कला अकादमी ने मुझे दिल्ली के सेंट्रल पार्क में आर्टिस्ट रेसिडेंसी के लिए इनवाइट किया था। मैंने उस पूरे वर्कशॉप को ‘प्रोजेक्ट मेमोरी’ नाम दिया। आठ दिन तक चले इस वर्कशॉप में मैंने कपड़ों से चार जेनरेशन की महिलाओं को कैनवास पर उतारा। इसके लिए भी मैंने और जे ने फेसबुक पर लोगों से अपील की थी कि आप अपनी सबसे प्रिय चीज लेकर आइए जिसे आप इस्तेमाल नहीं कर सकते लेकिन उस फेंकना भी नहीं चाहते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि 6-7 राज्य से लोग अपनी प्रिय चीज लेकर आए। लोग अपना सामने देते हुए काफी भावुक होते और उसके पीछे की कहानी बताते। मैंने लोगों के इमोशन को ध्यान में रखते हुए बिना उन कपड़ों को डैमेज किए बिना 20 फीट का आर्टवर्क बनाया।

मी बताती हैं कि 'प्रोजेक्ट मेमोरी' के इस आर्टवर्क को आज भी उन्होंने अपने पास संभाल कर रखा हुआ है।

मी बताती हैं कि ‘प्रोजेक्ट मेमोरी’ के इस आर्टवर्क को आज भी उन्होंने अपने पास संभाल कर रखा हुआ है।

उस दौरान मैं पांच हफ्ते की प्रेग्रेंट भी थी। लेकिन मुझे याद नहीं रहता था। जब तक मैं घर में होती तब तक प्रेग्रेंट होने का एहसास रहता। लेकिन जैसे ही मैं पार्क पहुंचती मैं भूल जाती कि प्रेग्रेंट हूं। वहां पर मैं सिर्फ आर्टिस्ट होती थी।

ट्रैवलिंग कम्युनिटी आर्ट के लिए बाइक से घूमी 18 राज्य

साल 2013 में एक दिन मैं और जे जेएनयू से लौट रहे थे, तब हम दोनों ने एक-दूसरे से पूछा कि हम अपनी लाइफ में क्या करना चाहते हैं। मैंने कहा कि मैं पूरी दुनिया को पेंट करना चाहती हूं और जे ने कहा कि वो घूमना चाहता है। यहां से ट्रैवल कम्युनिटी आर्ट का आइडिया आया। हमने फेसबुक पर इसके बारे में लिखा। हमने लोगों को इनवाइट किया कि अगर आपकी दिलचस्पी पेंटिंग में हैं तो आप हमारे घर आइए। हम आपको पेंट देंगे। बदले में आपको खाना बनाना होगा। हमारे इनविटेशन पर अलग-अलग फील्ड के कई लोग आए। सबने घंटों मिलकर हमारी सोसायटी की दीवार को रंगा। इसके बाद धीरे-धीरे हम दिल्ली पेंट करने के लिए दिल्ली से बाहर जाने लगे। लोग हमें अपने घरों में चार-पांच के लिए रखते। खाना खिलाते। बदले में हम उनके घर के एक हिस्से पर म्यूरल बनाते या पेंट करते।

मी के पति जे सुशील पत्रकार हैं। जब मी को अमेरिका में फेलोशिप मिली तब जे ने नौकरी छोड़ हाउस हसबैंड बनने का फैसला किया।

मी के पति जे सुशील पत्रकार हैं। जब मी को अमेरिका में फेलोशिप मिली तब जे ने नौकरी छोड़ हाउस हसबैंड बनने का फैसला किया।

इस तरह से हमने 18 राज्य की 35 जगहों पर 70 म्यूरल बनाए। अमेरिका आने के बाद भी हमने कम्युनिटी आर्ट बंद नहीं किया है। बस इसका नेचर बदल गया है।



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