संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित करने की मांग: SC ने याचिकाकर्ता से कहा- आप एक लाइन ही सुना दें; पब्लिसिटी याचिका बताकर खारिज की

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नई दिल्ली4 घंटे पहले

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सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने याचिका खारिज कर दी। इससे पहले पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, आप एक लाइन संस्कृत में सुना दो। इस पर याचिकाकर्ता रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट डीजी वंजारा ने एक श्लोक सुना दिया। इस पर पीठ ने कहा, यह तो हर कोई जानता है। क्या आप संस्कृत में एक लाइन बोल सकते हैं या आपकी रिट याचिका की प्रार्थना का संस्कृत में अनुवाद कर सकते हैं?

कोर्ट ने कहा, यह नीति निर्णय के दायरे में आता है। इसके लिए संविधान संशोधन जरूरी होगी। हम संसद को इसके लिए निर्देश नहीं दे सकते। पीठ ने याचि से पूछा कि क्या आप संस्कृत बोलते हैं? क्या अपनी याचिका का संस्कृत में अनुवाद कर सकते हैं। संस्कृत कितने शहरों में बोली जाती है। फिर कोर्ट ने याचिका सुनने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इसे पब्लिसिटी याचिका करार दिया।

रिटायर्ड आईएएस डीजी वंजारा की तरफ से अदालत में याचिका दायर की गई थी। उन्होंने संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित किए जाने के जरिए भाषा के प्रचार की बात की थी। इस पर बेंच ने सवाल किया, ‘भारत में कितने शहरों में संस्कृत बोली जाती है?’ बेंच ने पूछा, ‘क्या आप संस्कृत बोलते हैं? क्या आप संस्कृत में एक लाइन बोल सकते हैं या आपकी रिट याचिका की प्रार्थना का संस्कृत में अनुवाद कर सकते हैं।’ इसपर रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट ने एक श्लोक सुना दिया और बेंच की तरफ से जवाब मिला ‘यह हम सभी को पता है।’

याचिकाकर्ता वंजारा का कहना है कि वह केंद्र की तरफ से इस पर चर्चा चाहते हैं और अदालत की तरफ से एक दखल सरकार के स्तर पर चर्चा शुरू करने में मददगार होगा। सुनवाई के दौरान वंजारा ने ब्रिटिश राज के दौरान कोलकाता के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश विलियम जोन्स के बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी तरफ से पढ़ी गई 22 भाषाओं में एक बात साफ है कि संस्कृत मातृभाषा है। इस पर कोर्ट ने कहा, ‘हम भी यह बात मानते हैं। हम जानते हैं कि हिंदी और राज्यों की कई भाषाओं के शब्द संस्कृत से आए हैं। लेकिन इसके आधार पर किसी भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं घोषित किया जा सकता। हमारे लिए भाषा घोषित करना बहुत मुश्किल है।’

कोर्ट ने कही सरकार के सामने जाने की बात
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 32 का हवाला दिया और कहा कि शीर्ष न्यायालय के पास इसे लेकर गुंजाइश हैं और केंद्र का मत जानकर चर्चा शुरू की जा सकती है। इस पर कोर्ट ने कहा अगर याचिकाकर्ता इस तरह रिप्रेजेंटेशन पेश का विचार रखते हैं, तो उनके पास इसे लेकर सरकार के पास जाने की आजादी हो सकती है।

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