श्रीलंका लौटे पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे: भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट से निकाला गया; जन आंदोलन के बाद छोड़ना पड़ा था देश

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कोलंबो23 मिनट पहले

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे शुक्रवार देर रात सिंगापुर एयरलाइंस से अपने देश लौट आए हैं। 73 साल के राजपक्षे करीब 7 हफ्ते बाद बैंकॉक से सिंगापुर होते हुए श्रीलंका लौटे हैं। कोलंबो के बंदरानाइक इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कई मंत्रियों ने उनका स्वागत किया। उन्हें भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट से बाहर निकाला गया।

दरअसल, श्रीलंका में उत्पन्न हुए आर्थिक संकट के कारण जुलाई के पहले हफ्ते में जन आंदोलन शुरू हुआ। 9 जुलाई को आम जनता ने राष्ट्रपति आवास और प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया। जिसके बाद राजपक्षे अपना सरकारी घर छोड़कर भाग खड़े हुए। 13 जुलाई को परिवार समेत गोटबाया पहले मालदीव भागे। इसके बाद सिंगापुर पहुंचे। इसी दिन श्रीलंका में फिर से इमरजेंसी लगा दी गई।

श्रीलंका की राजनीति के दो सबसे ताकतवर चेहरे गोटबाया राजपक्षे (बाएं) और महिंदा राजपक्षे। गोटबाया पूर्व राष्ट्रपति हैं, जो जनता के विरोध की वजह से देश छोड़कर भाग गए थें। वहीं महिंदा ने विरोध के चलते मई में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। गोटबाया 2019 में श्रीलंका के राष्ट्रपति बने थे। वहीं महिंदा 2004 में प्रधानमंत्री रहने के बाद 2005-2015 तक राष्ट्रपति रहे थे।

राजपक्षे की पार्टी ने सरकार से सुरक्षा बढ़ाने की मांग की
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने राजपक्षे की स्वदेश वापसी के इंतजाम किए हैं। इसके लिए राजपक्षे के नेतृत्व वाली पार्टी एसएलपीपी ने विक्रमसिंघे से अनुरोध किया था। बता दें कि 19 अगस्त को एसएलपीपी के महासचिव सागर करियावासम ने इस संबंध में विक्रमसिंघे के साथ बैठक की थी। करियावासम के अनुरोध पर ही श्रीलंका सरकार ने राजपक्षे की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए हैं।

13 जुलाई को छोड़ा था देश
देश में अपने खिलाफ भड़के असंतोष के बाद राजपक्षे ने परिवार के साथ 13 जुलाई को श्रीलंका छोड़ दिया था। इसके बाद वो सिंगापुर पहुंचे। यहीं से उन्होंने पद से इस्तीफा मेल किया था। सिंगापुर ने दो बार में उन्हें 28 दिन रहने की मंजूरी दी। इसके बाद इसे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

श्रीलंका के कई संगठनों ने सिंगापुर से राजपक्षे के खिलाफ केस दर्ज करने को कहा था। हालांकि, इसके पहले ही उन्होंने यह देश छोड़ दिया। जानकारी के मुताबिक वे सिंगापुर से एक रूटीन फ्लाइट से थाईलैंड रवाना हुए।

थाईलैंड सरकार ने सशर्त विजिटिंग वीजा दिया था
राजपक्षे सिंगापुर में परमानेंट रेसीडेंशियल की परमिशन चाहते थे, लेकिन वहां की सरकार ने उन्हें यह मंजूरी नहीं दी। जिसके बाद उन्होंने थाईलैंड से देश आने की मंजूरी मांगी थी। थाईलैंड सरकार ने मानवीय आधार पर 73 साल के राजपक्षे को विजिटिंग वीजा दिया था। खास बात यह थी सरकार ने उन्हें वीजा सशर्त दी थी। सरकार का कहना था कि राजपक्षे यहां रहकर किसी दूसरे देश में स्थायी शरण पाने के लिए कोशिश कर सकते हैं, लेकिन वो यहां से श्रीलंका से जुड़ी किसी पॉलिटिकल एक्टिविटी में हिस्सा नहीं ले सकेंगे।

आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के लोगों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया था। जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर भाग गए थे। वे पहले मालदीव भागे। इसके बाद सिंगापुर पहुंचे। यहीं से उन्होंने इस्तीफा दिया।

आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के लोगों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया था। जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर भाग गए थे। वे पहले मालदीव भागे। इसके बाद सिंगापुर पहुंचे। यहीं से उन्होंने इस्तीफा दिया।

देश छोड़कर भागे थे गोटबाया
राजपक्षे को सत्ता से उखाड़ने इस जन आंदोलन का आखिरी चरण जुलाई के पहले हफ्ते में शुरू हुआ। 9 जुलाई को आम जनता ने राष्ट्रपति आवास और प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया। गोटबाया अपना सरकारी घर छोड़कर भाग खड़े हुए। 13 जुलाई को परिवार समेत गोटबाया पहले मालदीव भागे। इसके बाद सिंगापुर पहुंचे। इसी दिन श्रीलंका में फिर से इमरजेंसी लगा दी गई।

श्रीलंका के आर्थिक संकट के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले ताकतवर राजपक्षे परिवार को सत्ता से उखाड़ फेंकने का श्रेय आम जनता के आंदोलन को जाता है, जो श्रीलंका के इतिहास में अनूठा है।

राजधानी कोलंबो के पास स्थित चर्चित गाले फेस ग्रीन प्रदर्शनकारियों के नारे #GotaGoGama यानी 'गोटाबाया गांव जाओ' के नाम से भी चर्चित हो गया। यहीं राजपक्षे के समर्थकों ने 9 प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी थी।

राजधानी कोलंबो के पास स्थित चर्चित गाले फेस ग्रीन प्रदर्शनकारियों के नारे #GotaGoGama यानी ‘गोटाबाया गांव जाओ’ के नाम से भी चर्चित हो गया। यहीं राजपक्षे के समर्थकों ने 9 प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी थी।

5 पॉइंट्स से समझिए कि कैसे ये विरोध पूरे श्रीलंका में फैला…

1. पुलिस और प्रदर्शनकारी पहली बार मिरिहाना में आए आमने-सामने: 31 मार्च को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के मिरिहाना में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ, जिसमें हजारों की संख्या में लोग पहुंचे। इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।

इस हिंसक झड़प में कई प्रदर्शनकारी घायल हो गए और कइयों को हिरासत में लिया गया। यहां तक कि पुलिस ने इस घटना को कवर करने गए 6 पत्रकारों को भी हिरासत में ले लिया। कुछ पत्रकारों की पुलिस ने पिटाई भी की।

2. चर्चित लोग और विपक्षी पार्टियां भी लोगों के प्रदर्शनों से जुड़ने लगीं: आम लोगों के विरोध प्रदर्शनों से जल्द ही चर्चित लोग भी जुड़ने लगे। श्रीलंका की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समागी जान बालवेगया यानी SJB के अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति आर प्रेमदासा के बेटे सजित प्रेमदासा मार्च के अंत तक इस जन आंदोलन से जुड़ चुके थे।

SJB के अलावा तमिल नेशनल अलायंस, नेशनल पीपुल्स पावर, जनता विमुक्ति पेरामुना, फ्रंटलाइन सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टियां भी राजपक्षे सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में उतर गईं।

3. जयसूर्या, संगकारा, रणतुंगा समेत कई पूर्व क्रिकेटर भी विरोध की पिच पर उतरे: यही नहीं मिरिहाना में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ कई पूर्व क्रिकेटरों ने आवाज उठाई और प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया। इनमें अर्जुन रणतुंगा, कुमार संगकारा, मर्वन अटापट्टू, रौशन महानामा, सनथ जयसूर्या और मुथैया मुरलीधरन जैसे पूर्व क्रिकेट भी शामिल थे। महानामा, जयसूर्या और अटापट्टू ने तो 2 अप्रैल को कोलंबो में हुए विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया।

यह भी पढ़ें- गोटबाया राजपक्षे सूटकेस लेकर भागे; श्रीलंका को भुखमरी के दलदल से कौन उबारेगा

4. राजपक्षे सरकार ने लगाई इमरजेंसी, पर प्रदर्शनकारियों को रोक नहीं पाई: राजपक्षे सरकार ने इन प्रदर्शनों को कुचलने की पुरजोर कोशिश की। 1 अप्रैल को श्रीलंका में आपातकाल लगा दिया गया। 2 अप्रैल को श्रीलंकाई सरकार ने प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए फेसबुक, वॉट्सऐप, ट्विटर, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और स्नैपचैट समेत सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन लगा दिया।

हालांकि, ये बैन 15 घंटे बाद ही हटा लिया गया। लोगों के बढ़ते विरोध के बीच तब के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे और उनके भाई और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को छोड़कर श्रीलंका की पूरी कैबिनेट को इस्तीफा देना पड़ा।

5 अप्रैल को राजपक्षे ने सदन में अपना बहुमत गंवा दिया, साथ ही आपातकाल भी हटा दिया गया। लोगों की नाराजगी खत्म करने के लिए गोटबाया ने विपक्षी दलों को उनकी सरकार में शामिल होने का न्योता दिया, लेकिन विरोध प्रदर्शन नहीं रुका।

5. गाले फेस बना आंदोलनकारियों का गढ़, 8 प्रदर्शनकारी मारे गए: राजधानी कोलंबो में 5 हेक्टेयर (करीब 5.4 लाख स्क्वायर फीट) में फैला चर्चित टूरिस्ट स्थान गाले फेस ग्रीन अप्रैल में राजपक्षे सरकार के खिलाफ प्रदर्शनकारियों का मजबूत गढ़ बन गया।

9 अप्रैल को प्रदर्शनकारियों ने गाले फेस ग्रीन पर कब्जा करते हुए वहां प्रोटेस्ट कैंप बना दिए। इन कैंपों में बेसिक जरूरतों की सभी चीजें मसलन-खाना, पानी, टॉयलेट और मेडिकल फैसिलिटी के साथ ही लाइब्रेरी की भी व्यवस्था की गई है।



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