लोकतंत्र बेहाल: रूस में तानाशाही, नागरिक अधिकारों का दमन, इसी राह पर चीन भी

0
16


  • Hindi News
  • National
  • Bhaskar Opinion Dictatorship In Russia, Suppression Of Civil Rights, China Also On The Same Path

2 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

रूस की लुकऑइल कंपनी के चैयरमेन रविल मगनोव मृत पाए गए। यहां के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती थे। भर्ती क्या, कैद ही थे। उसी अस्पताल की खिड़की से गिर पड़े। चौथी मंजिल से गिरे इसलिए मौत हो गई। वे पहले रूसी उद्योगपति थे, जिन्होंने पुतिन का विरोध किया था। यूक्रेन से युद्ध को उन्होंने मानवता के विरुद्ध बता दिया था। तभी से उनके खिलाफ तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे थे। अंततः मृत पाए गए।

दरअसल, लंबे कार्यकाल की सत्ता, शासक को तानाशाह बना देती है। खासकर, उन देशों में जहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नहीं होते। चुनाव के नाम पर कुछ लोग खानापूर्ति करते हैं और मनोनयन हो ज़ाया करता है। सीमित मताधिकार के नाम से इस प्रक्रिया को जाना जाता है। जैसा अंग्रेजों के राज में भारत में होता था। कुछ कुलपति, न्यायाधीश और चाय बागानों के मालिकों को ही मताधिकार हुआ करता था।

बहरहाल, ऐसे देशों में जनता के अधिकार तो होते ही नहीं हैं। केवल उनकी बातें होती हैं। … और जो कोई सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत करता है या सरकारी नीतियों की आलोचना करने की हिमाकत करता है, वह इसी तरह किसी भवन या किसी अस्पताल की खिड़की के नीचे मृत पाया जाता है। रूस में इस तरह की घटनाएं अब बढ़ गई हैं। इस सब को रोकने के लिए ही सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाच्योव ने लगातार कोशिशें कीं।

वे दुनियाभर में तो शांति का संदेश देने में सफल हो गए, लेकिन अपने ही देश में खुलापन लाना उन्हें महंगा पड़ा। देश के कई टुकड़े हो गए। इनमें से एक रूस है। रूस के राष्ट्रपति चाहे बोरिस येल्तसिन रहे हों या मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन, दोनों ने गोर्बाच्योव के शांति और खुलेपन के प्रयासों को बेरहमी से कुचला। जिस तानाशाही को खत्म करने के लिए गोर्बाच्योव ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसी तानाशाही का सहारा लेकर येल्तसिन ने राज किया और वही अब पुतिन भी कर रहे हैं।

उनका कार्यकाल बड़ा लंबा है। 1999 से 2000 तक और 2008 से 2012 तक वे रूस के प्रधानमंत्री रहे, जबकि 2000 से 2008 तक राष्ट्रपति रहे। मौजूदा कार्यकाल उनका 2012 से शुरू हुआ। तब से लगातार राष्ट्रपति बने हुए हैं। जब कार्यकाल इतना लम्बा हो तो व्यक्ति का तानाशाह बनना लाजिमी है। इसलिए पुतिन जो चाह रहे हैं, कर रहे हैं। यूक्रेन से युद्ध की उनकी जिद को दुनिया भुगत ही रही है। और जो कोई इसका विरोध कर रहा है, वह मुंह की खा रहा है।

इन्हीं के पदचिन्हों पर इनके चीनी मित्र भी चल रहे हैं। शी जीनपिंग ने पिछले साल अपनी पार्टी में दो कार्यकाल से ज्यादा राष्ट्रपति न रहने के नियम को बदलवा दिया था। अब जल्द ही वे अपना एक और कार्यकाल पक्का करने जा रहे हैं। उनकी पार्टी की एक भारी भरकम मीटिंग में जल्द उन्हें फिर से नेता चुने जाने का फैसला होने वाला है। तानाशाही का यह आलम खत्म होना चाहिए। आखिर नागरिक अधिकारों के लिए इस दुनिया में कोई तो कुछ करे! कोई तो लड़े!

खबरें और भी हैं…



Source link