रैंडम एक्ट ऑफ काइंडनेस: लोगों की छोटी सी मदद हमारा जीवन बदल देती है, लेकिन ‘दूसरे क्या सोचेंगे’ विचार हमें मदद करने से रोकता है

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वॉशिंगटन4 मिनट पहलेलेखक: कैथरीन पियर्सन, द न्यूयॉर्क टाइम्स

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आपका दयालुता भरा रवैया, किसी की छोटी-छोटी मदद सिर्फ आपको या मदद पाने वाले को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को खुशियों से भर सकता है। जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी में छपी नई रिसर्च के अनुसार, हम कई बार किसी की मदद कर सकने की हालत में होने पर भी यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि वह या दूसरे क्या सोच रहे होंगे। हमारी यह सोच हमें कई बार लोगों की छोटी-छोटी मदद करने से भी रोक देती है।

मनोवैज्ञानिक मैरिसा फ्रैंको कहती हैं, हम अपने व्यवहार के सकारात्मक पहलू की ओर ध्यान नहीं दे पाते। मदद के लिए समाज में सामने आने की जब जरूरत होती है, मन में नकारात्मकता आने लगती है। वे कहती हैं, ‘इस तरह की स्टडी में यह बात साबित होने के बाद और लोग भी हिचकिचाहट छोड़ेंगे और समाज में जाने-अनजाने लोगों की मदद करेंगे।’

रिसर्च में लोगों से मदद कराई गई
इस रिसर्च के लिए 8 अलग-अलग एक्सपेरिमेंट किए गए। एक प्रयोग में स्नातक के विद्यार्थियों को लोगों की मदद करने को कहा गया। इसमें घर से कॉलेज लाना, किसी को कॉफी या चाय पिलाना जैसी कोई भी मदद हो सकती है।

दूसरे प्रयोग में 84 प्रतिभागियों को 2 दिन ठंडी जगह रखा गया, जहां उन्हें गर्म चॉकलेट देकर कहा गया कि वे इसे या तो खुद खा सकते हैं या फिर किसी और को दे सकते हैं। उनमें से 75 प्रतिभागियों ने अपनी चॉकलेट किसी और को दे दी। फिर उनसे रेटिंग करने को कहा गया कि जिसे उन्होंने चॉकलेट दी, उन्हें कैसा लगा होगा।

जिसकी मदद की, उसके अनुभव का सही आकलन जरूरी
इसमें वे जो आमतौर पर लोगोें की मदद करते रहते हैं, उन्हें लगा कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है और उन लोगों को कोई खास फर्क नहीं पड़ा होगा। जबकि वे लोग जो मदद नहीं करते, उन्हें लगा कि चॉकलेट पाने वाले लोग बहुत ज्यादा खुश होंगे।

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के मार्केटिंग और मनोविज्ञान के प्रोफेसर अमित कुमार इस रिसर्च का हिस्सा रहे हैं। वे कहते हैं कि हम जिसकी मदद करते हैं, उसने कैसा अनुभव किया इसका गलत आकलन हमें मदद करने से रोकता है। इसी तरह के और कई प्रयोग करने के बाद डॉ. अमित कुमार कहते हैं जिनकी मदद की गई, वे इससे बहुत ज्यादा प्रभावित हुए, लेकिन मदद करने वाले को इसका एहसास नहीं था।

हमें दयालु होने के विचार से मुश्किल होती है
दोस्तों से मुलाकात-बातचीत, यहां तक कि मोबाइल पर मिला संदेश भी हमें सुकून से भर देता है। नई रिसर्च से पता चला है कि लोगों की मदद करने में भी उतनी ही शक्ति होती है। लोगों की मदद, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, तनाव कम करती है।

क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक तारा कौजिनौऊ कहती हैं लोग दया चाहते हैं। बावजूद इसके अक्सर दयालु होने के विचार से असुविधा महसूस करते हैं। वे कहती हैं- दयालुता एक जोश है, जब यह उठता है तो हम कुछ ज्यादा ही सोचने लगते हैं।

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