पद्मश्री तुलसी गौड़ा को पेड़ों की दुर्लभ जानकारियां: 65 साल से बंजर जमीन में पौधे लगाकर बच्चों सी देखभाल करती हैं, अधिकारी भी लेते हैं सलाह

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होनाली (कर्नाटक)2 घंटे पहलेलेखक: समीर यासिर

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कर्नाटक के होन्नाली के घने रेनफॉरेस्ट में करीब 80 साल की एक बुजुर्ग महिला सैकड़ों पेड़ों से स्वस्थ शाखाओं को सावधानी के साथ काटकर उनसे नए पौधे लगाने में जुटी है। वे दुर्लभ प्रजातियों के पेड़ों और बीजों के बारे में बात करती हैं तो उनकी आंखों में चमक आ जाती है। इनके बारे में वे ऐसे बताती हैं, जैसे कोई एनसाइक्लोपीडिया हों। वह भी तब जब उन्होंने पढ़ाई तक नहीं की।

यह बजुर्ग महिला हैं तुलसी गोविंद गौड़ा। वे कहती हैं,‘मैं हरे पेड़ों से भरे इन जंगलों को देखती हूं तो लगता है कि पेड़ों को काटे बगैर इंसान समृद्ध बन सकते हैं…।’ तुलसी ने अपनी पूरी जिंदगी कर्नाटक में बंजर जमीन को जंगलों में बदलने में समर्पित कर दी है। हालांकि इस बात का पता दुनिया को तब चला, जब पर्यावरण सुरक्षा में योगदान के लिए तुलसी को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

सम्मान लेने के लिए वे पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा पहनकर पैरों में कुछ पहने बिना ही पहुंची थीं। क्योंकि पूरी जिंदगी उन्होंने कभी जूते नहीं पहने। घर के आंगन में लगी कुर्सी पर बैठकर भी वे इसी सादगी से सभी का स्वागत करती हैं। सम्मान मिलने के बाद उनके घर पर मिलने वालों का तांता लगा रहता है। गांव के लोग उन्हें देखकर आदर से सिर झुका लेते हैं। बच्चे उनके साथ सेल्फी लेते हैं। छात्रों से भरी बसें उनके घर पर पहुंचती हैं।

जहां वे परिवार के दस सदस्यों के साथ रहती हैं। तुलसी कहती हैं, बच्चों को पौधों के बारे में जानकारी देकर खुशी मिलती है। उन्हें पेड़ों को महत्व समझाना होगा। तुलसी को पक्का तो याद नहीं है, पर वो जब 12 साल की थीं, तबसे पौधे लगाने और उनकी देखभाल कर रही हैं। उन्होंने पेड़ लगाकर बाकी ग्रामीणों से उलट जंगल की कटाई रोकने का काम किया।

वे मां के साथ जंगल जाती थीं। उन्होंने ही तुलसी को सिखाया कि स्वस्थ पेड़ों के बीजों से कैसे नए पौधे उगाए जाते हैं। स्थानीय वन अधिकारियों और निवासियों के मुताबिक किशोरावस्था में ही उन्होंने अपने घर के पीछे के बंजर क्षेत्र को घने जंगल में बदल दिया था। पड़ोस में रहने वाली रुक्मिणी बताती हैं,‘बचपन से ही वह पौधों से ऐसे बात करती हैं, जैसे मां अपने शिशु से करती है।

रुक्मिणी भी दशकों से तुलसी को इस नेक काम में सहयोग दे रही हैं। वन विभाग से जुड़े रहे 86 साल के रेड्‌डी बताते हैं, अपनी पोस्टिंग के पहले दिन चिलचिलाती धूप में वे तुलसी से मिले। उस वक्त वो मिट्‌टी से कंकड़-पत्थर हटाकर उनमें सावधानी के साथ बीज और पौधे लगा रही थी। रेड्‌डी कहते हैं,‘ तुलसी के हाथों में जादू है। देसी प्रजातियों को पहचानना, उन्हें ध्यान से जमा करना और उनके पोषण संबंधी छोटी-छोटी जानकारियां तुलसी के पास हैं।

ये नॉलेज कहीं किसी किताब में भी नहीं मिलता। बस तबसे ही उन्होंने तुलसी को अपना सलाहकार नियुक्त कर लिया। रेड्‌डी के साथ जुड़ने के बाद तुलसी की अलग पहचान बन गई। स्थानीय लोग उन्हें पेड़ों की देवी (द गॉडेस ऑफ ट्रीज) कहने लगे। तुलसी ने सरकारी नर्सरी में 65 वर्षों तक सेवाएं दीं। 1998 में आधिकारिक तौर पर रिटायर होने के बाद भी वे सलाहकार के रूप में सक्रिय हैं और पेड़-पौधों से जुड़ी मूल्यवान जानकारियां साझा करती हैं।

थकान मिटाने खेतों में पहुंच जाती हैं: मेहमानों से मिलने के बाद तुलसी जब थका हुआ महसूस करती हैं तो चावल के खेतों में टहलने निकल जाती हैं। अपनी आदमकद तस्वीर के पीछे फैले बबूल के घने जंगलों में चहलकदमी उन्हें ताजगी महसूस करवाती है। यहां पर घूमते हुए भी उनकी जबान पर पेड़ों के नाम ही होते हैं।

कन्नड़ भाषा में बरगद, इमली या कोकम प्रजाति के पौधों के नाम तो वे ऐसे लेती हैं, जैसे कि उनके घर के कोई सदस्य हों। तुलसी पढ़ी-लिखी नहीं है, पर इतना जरूर समझती हैं कि दुनिया में आ रही आपदाओं की एक बड़ी वजह जंगलों की बेतहाशा कटाई भी है। तुलसी कहती हैं, इस स्थिति को पलटने में लंबा वक्त लगेगा। पर वे भविष्य को लेकर आशावादी हैं।

सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने के बाद तुलसी बड़ी हस्ती तो हो गई हैं, पर उनकी जिंदगी में कुछ नहीं बदला है। सिवाय इसके कि स्थानीय परिषद ने उनके घर के बाहर लकड़ी का पुल बना दिया है ताकि वे छोटी सी धारा को पार कर सकें। पर तुलसी इसका इस्तेमाल भी नहीं करतीं, उन्हें धारा के बीच से गुजरना ही अच्छा लगता है।

हालांकि अब वे काफी कमजोर हो चुकी हैं। पर इलाज के लिए उनकी जनजाति औषधीय महत्व के पौधों का ही इस्तेमाल करती है। वे जानती हैं कि दुनिया में उनका सफर अब बहुत लंबा नहीं है, इसलिए कहती हैं, ‘सबसे अच्छी मौत वही होगी जो एक घनी शाखाओं वाले पेड़ के नीचे हो। और दोबारा जन्म मिले तो एक बड़े पेड़ के रूप में धरती पर आना चाहेंगी। जिंदगी में पेड़ ही ऐसी चीज है, जिसे वे सबसे ज्यादा पसंद करती हैं।

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