नौकरी खातिर मार्च कर रही बेटियों से पुलिस की बदसलूकी: चलते-चलते लड़कियों को नहीं आ रहे पीरियड्स, मनोबल तोड़ने को प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया

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नई दिल्ली20 मिनट पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

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पिछले 17 महीने से हम लोग दर-दर भटक रहे हैं। चिलचिलाती धूप, लू के थपड़े, बारिश और उमस वाली चिपचिपी गर्मी। न भर पेट खाना न सोने का ठिकाना। कहीं खुले में नहाना पड़ा तो कहीं भूखे पेट सड़क पर किनारे सोना पड़ा। चलते-चलते चप्पल टूट गई। पैरों में छाले पड़ गए। शरीर कमजोरी और बीमारी का घर हो गया। कई लड़कियां पीरियड्स में बेहोश हो रहीं तो किसी को पीरियड्स नहीं आ रहे हैं। पुलिस प्रशासन से पिटाई खाई। बदसलूकी झेली, लेकिन शरीर पर वर्दी पहनने की आस बनी रही, जो अब टूटती हुई नजर आ रही है। यह कहना है एसएससी जीडी 2018 के तहत पैरा मिलिट्री फोर्सेज में नियुक्ति पत्र की मांग को लेकर नागपुर से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाल रही लड़कियों का।

अंधेरे में आ गया भाई-बहनों का भविष्य
इस पैदल मार्च में ओडिशा के 19 लड़के और चार लड़कियां भी शामिल हैं। इन्हीं लड़कियों में से एक दश्मिता ने बताया, ‘मेरे पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। उनकी मजदूरी के पैसों से ही पूरे घर का खर्च चलता था। पापा बीमार रहने लगे तो मां मजदूरी पर जाने लगीं। मैं अपने घर में सबसे बड़ी हूं। मुझसे छोटी दो बहनें और एक भाई है। खून पसीने की कमाई से पाई-पाई बचाकर मां-पापा ने मुझे 12वीं तक की पढ़ाई करवा दी। मैंने इस एग्जाम के लिए बहुत मेहनत की और पास भी हो गई। मुझे लगा कि अब मैं परिवार की जिम्मेदारी उठा सकूंगी। मेरे भाई-बहन अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेंगे, लेकिन सारे पद न भरने से मेरे सपने टूट गए। मेरे भाई-बहनों का भविष्य अंधेरे में आ गया। मां की कमाई से सब दो वक्त खाना खा सकते हैं या फिर भाई-बहन पढ़ सकते हैं। दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते हैं।’

परिवार ताने सुनकर भी बेटी के साथ खड़ा
दश्मिता बताती हैं कि गांव की कोई लड़की घर से एक हफ्ते के लिए बाहर जाती है तो लोग तरह-तरह की बातें सुनाने लगते हैं। सवाल करते हैं कि लड़की भाग गई क्या? मैं पिछले 17 महीनों से कभी दिल्ली तो कभी नागपुर में अपने हक की लड़ाई लड़ रही हूं और मेरा परिवार लोगों से मेरे सम्मान के लिए लड़ रहा है। गांव वालों की अनगिनत बातें सुनने के बाद भी मेरा परिवार इस लड़ाई में मेरा साथ दे रहा है। वो जानते हैं कि हम हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन सोमवार देर रात पुलिस ने जो बदसलूकी की है, उसके बाद मुझे अपने सारे सपने चकनाचूर होते नजर आ रहे हैं।

एग्जाम पास किए, लेकिन नौकरी नहीं मिली
महाराष्ट्र के पुणे की रहने वाली परणीता कुमावत बताती हैं कि परिवार में मां-पापा, भाई-भाभी और एक भतीजा है। भाई-भाभी अपने बच्चे के साथ अलग रहते हैं। मां-पापा ने मुझे ग्रेजुएशन कराया ताकि मैं आत्मनिर्भर बन सकूं। मैं हॉस्टल में रही। मैंने एसएससी जीडी 2018 भर्ती के लिए रिटन, फिजिकल और मेडिकल टेस्ट पास किया, लेकिन मुझे नियुक्ति नहीं मिली। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। कोरोना के बाद से पापा की अर्निंग भी बंद हो गई और मां की तबीयत ठीक नहीं रहती। हमने जबसे अपने हक के लिए आवाज उठाने के बारे में सोचा। बस तभी से हमारे बुरे दिन शुरू हो गए। रास्तों की ठोकर और पुलिस प्रशासन की मार खा रहे हैं।

फरवरी, 2021 से लड़ रहीं हूं हक की लड़ाई
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की रहने वाली रुपाली हिमरन ने बताया- फरवरी, 2021 से हम लोग वर्दी पहनने का हक मांग रहे हैं। हमने एग्जाम पास किया है। वैकेंसी खाली हैं तो फिर नियुक्ति देने में सरकार को इतना सोचना क्यों पड़ रहा है। फरवरी, 2021 से हम लोगों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया। इसके बाद 72 दिन नागपुर में अनशन किया, लेकिन जब सिर्फ आश्वासन ही मिले, नौकरी नहीं। तब हम लोगों ने एकजुट होकर पैदल मार्च निकालने का फैसला किया।

1 जून को नागपुर से दिल्ली के लिए किया था कूच
नागपुर के संविधान चौक से 1 जून को 4 लड़कियों समेत 40 बेरोजगार युवाओं ने नागपुर से दिल्ली के जंतर-मंतर के लिए पदयात्रा शुरू की थी। धीरे-धीरे इसमें देश भर से बेरोजगार युवा जुड़ने लगे। अभी महाराष्ट्र के अलावा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा, असम, बिहार और उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवा पैदल मार्च में शामिल हैं। इन 200 युवाओं में 35 लड़कियां हैं।

लड़कियां हो रहीं बीमार, शरीर में हुआ इंफेक्शन
रुपाली के मुताबिक, हम लोग पिछले दो महीने से लगातार चल रहे हैं। न पेट भर खाना मिल पाता और न इस गर्मी में सुकून की नींद। हम लोगों को सड़क के किनारे सोना पड़ता है। थके होने के बावजूद डर के मारे रात भर नींद नहीं आती है। इससे शरीर कमजोर हो गया और कई लड़कियां बीमार भी हो गईं। गर्मी में चलते-चलते पसीने से तरबतर हो जाते हैं। बारिश में भीगते हैं और गीले कपड़े पहने ही चलते रहते हैं, जिससे बाॅडी में इंफेक्शन हो गया। हम लड़कियों के साथ वाॅशरूम को लेकर दिक्कत रहती है। कई जगह हम लोगों को खुले में नहाना पड़ता है।

किसी को पीरियड्स नहीं आ रहे तो किसी के पास पैड्स खत्म
रुपाली कहती हैं कि सबसे ज्यादा दिक्कत पीरियड्स में होती है। लड़कियां दर्द से तड़पती हैं, लेकिन लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। खाना-पीना छोड़िए हम लोगों के पास पैड्स खरीदने के लिए भी पैसे खत्म हो चुके हैं। ऐसे में आसपास के गांव की महिलाओं से मदद मांगनी पड़ी। वहीं कुछ लड़कियों को पीरियड्स ही नहीं आ रहे हैं। हालांकि, मार्च में शामिल लड़के हम लड़कियों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखते हैं। पुलिस के अलावा, हमारे साथ किसी ने भी बदसलूकी नहीं की है।

डीएम ने नहीं खाने दिया खाना, पुलिस ने धूप में बिठाया
महाराष्ट्र से ही पैदल मार्च में शामिल अभ्यर्थी हर्षदा बताती हैं कि महाराष्ट्र पुलिस ने हम लोगों को परेशान नहीं किया, लेकिन जैसे ही हमने मध्य प्रदेश में कदम रखा। बस वहीं से हमारे साथ बदसलूकी शुरू हो गई। मध्य प्रदेश के सागर जिले के डीएम ने हमें वहां खाने और पीने के लिए नहीं रुकने दिए। 49 डिग्री पारे में हम लोगों को बिना रुके चलते रहने का फरमान जारी कर दिया। आगरा पुलिस ने हम लोगों को पहले गुरुद्वारे में रुकवाया और उसके बाद जबरन बस में ठूंसा और धौलपुर, मुरैना, शिकोहाबाद व इटावा ले जाकर छोड़ दिया। हमारे साथियों के मोबाइल फोन भी छीन लिए और फिर कभी यूपी न आने की चेतावनी देकर छोड़ा गया। जब मथुरा पहुंचे तो वहां की पुलिस ने भी हमारे साथ बदसलूकी की। पूरे दिन धूप में बैठाकर रखा। इस कारण दो लड़कियों की तबीयत बिगड़ गई।

हरियाणा पुलिस ने लड़कियों से की मारपीट, तोड़ दिए सिम
हर्षदा बताती हैं कि सागर, आगरा और मथुरा के बाद हरियाणा में पलपल पुलिस हम लोगों के हौसले तोड़ने के लिए अपनी पुरजोर जोरआजमाइश की। पलवल पुलिस ने हमारे दो लड़कियों समेत छह साथियों को गायब कर दिया। वो जेल हैं या फिर कहीं और कैद कर रखे गए हैं, हम लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं। पुलिस अधिकारियों ने लड़कियों के साथ धक्का-मुक्की की। कुछ लड़कियों को थप्पड़ भी जड़ दिए। लड़कियां रोईं, चिल्लाईं, लेकिन उन लोगों ने एक बात नहीं सुनी। हम में से कई के फोन और सिमकार्ड तोड़ दिए गए। हमारे फोन से सारे फोटो और वीडियो डिलीट करवा दिए। अब घर वालों से बात नहीं हो पा रही है।

घरवालों को फोन कर धमका रही पुलिस
उनका कहना है कि 1 अगस्त की रात पुलिस नें जबरदस्ती बस में ठूंसा और अलग-अलग जगह लेकर अंधेरे में छोड़ दिया। 160 लोग हम सब बिखर गए हैं। दो पेज पर पता नहीं क्या लिखा था, लेकिन पुलिस ने हमसे जबरदस्ती हस्ताक्षर करवा लिए और हम लोगों को पढ़ने भी नहीं दिया। हमसे हमारे घर का पता और परिवार के फोन नंबर लिए, जिन्हें फोनकर धमकाया जा रहा है। पुलिस ने हमारे परिवार से कहा कि अपनी बेटी को वापस बुला लो, वरना जिंदगी भर जेल में सड़ेगी। इससे हमारे माता-पिता फिक्रमंद हो उठे हैं। हालांकि, हम लोगों ने उनको समझाने की कोशिश की है कि आप परेशान मत होइए, हमने कोई क्राइम नहीं किया है।

बताते-बताते रो पड़ी बेटियां
परिणीता फोन पर बताती हैं, ‘अब घर वाले कहते हैं कि घर लौट आओ और शादी कर लो। यह बताते हुए परणीता फोन पर रो पड़ती हैं। थोड़ी देर बाद शांत होती हैं, तब कहती हैं, मैंने पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने का सपना देखा। मैं अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। अपने बूढ़े मां-बाप का सहारा बनना चाहती हूं। ऐसे में शादी कैसे कर लूं।’

प्रेग्नेंसी टेस्ट तक कराया..खाने-पीने की मदद बंद करा दी
परिणीता कहती हैं कि एक ओर सरकार बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं का नारा लगाती है और दूसरी ओर पढ़ी-लिखी लड़कियों को नौकरी न देकर घर में कैद कर रही है। उन्हें पुलिस से मार खिलवा रही है, आखिर यह कैसा इंसाफ है। इन लड़कियों का कहना है कि आमरण अनशन के दौरान मनोबल तोड़ने के लिए लड़कियों का प्रेगेनेंसी टेस्ट तक कराया गया। रास्ते में भी होटल वालों से कह दिया गया कि हमारी मदद ना करें। हम टूटेंगे नहीं क्योंकि हम अपना हक मांग रहे हैं, भीख नहीं।

आइए अब बताते हैं आखिर क्या है पूरा मामला?
जुलाई 2018 में एसएससी जीडी के तहत पैरा मिलिट्री फोर्सेज की भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया गया था। 31 मार्च 2020 को इस नोटिफिकेशन को संशोधित कर बताया गया कि 60210 पदों के लिए भर्ती होनी है। इस भर्ती में 30 लाख 41 हजार 284 युवाओं ने हिस्सा लिया, जिसमें लड़कियां भी शामिल थीं। रिटन, फिजिकल और मेडिकल सारी परीक्षाओं के बाद कुल 109552 अभ्यर्थियों को योग्य पाया गया। फिर जनवरी 2021 को परीक्षा का अंतिम परिणाम जारी किया गया, लेकिन इसमें 60,210 की जगह पर 55, 913 अभ्यर्थियों का ही चयन किया गया।

जंतर मंतर पर धरना दिया, सांसदों को ज्ञापन सौंपा
फिर फरवरी 2021 से एग्जाम पास कर चुके युवाओं ने बाकी के 4297 पद भरने की मांग के साथ लड़ाई शुरू की। युवाओं ने बताया कि हमने पहले करीब एक साल दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दिया। सभी सांसदों को ज्ञापन सौंपा। तीन सांसदों ने संसद में आवाज भी उठाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। फिर नागपुर में 72 दिन का आमरण अनशन किया। इसके बाद केंद्र सरकार में मंत्री रामदास आठवले ने हमें भरोसा दिया कि हमारी मुलाकात गृह मंत्री अमित शाह से कराई जाएगी। हमें वक्त भी दे दिया गया। जब हम 10 युवा दिल्ली पहुंच गए तो कहा गया कि मीटिंग नहीं हो सकती और धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।

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