जम्मू-कश्मीर में नए वोटर होंगे किंगमेकर: यहां इकोनॉमी की रीढ़ हैं प्रवासी; कई इलाके छोटा बिहार के नाम से चर्चित

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जम्मू41 मिनट पहलेलेखक: मोहित कंधारी

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जम्मू-कश्मीर में चुनाव से पहले मतदाता सूची तैयार करने का काम पूरे जोरशोर से चल रहा है। इस बार 25 लाख नए मतदाता जुड़ सकते हैं। आयोग ने घोषणा की है कि यहां रह रहे दूसरे राज्यों के लोग भी जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत खुद का नाम मतदाता के तौर पर जुड़वा सकते हैं। आयोग की इस घोषणा के बाद से इन प्रवासियों में जबरदस्त उत्साह है।

केंद्र शासित प्रदेश में दशकों से रह रहे प्रवासियों का कहना है कि वोटिंग का हक मिलने से अब उनकी आवाज भी सुनी जाएगी। हालांकि, कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां प्रवासियों को वोटिंग का हक देने का विरोध कर रही हैं। इस बीच, भास्कर ने जम्मू में प्रवासियों की बड़ी बस्तियों डिगिआना, प्रीत नगर, नानक नगर, मीरां साहिब, कुंजवानी, कासिम नगर, राजीव नगर का दौरा किया।

बिहार के अजय बोले- उनके पिता 1981 में जम्मू आकर बस गए थे
बिहार के भागलपुर जिले से यहां आकर बसे फल विक्रेता अजय शाह कहते हैं कि उनके पिता 1981 में जम्मू आकर बस गए थे। मेरे दोनों बेटे डिग्री कॉलेज में कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हम लोग लोकसभा चुनावों में बहुत पहले से वोट डालते आ रहे हैं, लेकिन अनुच्छेद 370 के चलते विधान सभा चुनाव में वोट डालने से वंचित रहते थे। अब वो बाधा खत्म कर दी गई है।

अजय ने बताया कि वह परिवार के सभी 8 सदस्यों का वोटर कार्ड बनवा रहे हैं।

अजय ने बताया कि वह परिवार के सभी 8 सदस्यों का वोटर कार्ड बनवा रहे हैं।

अजय शाह के पिता भूपाल शाह कहते हैं कि 1996 और 2002 के चुनावों में यहां रहने वाले कुछ प्रवासियों ने वोट डाला था, लेकिन प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के विरोध के बाद वोटिंग लिस्ट से उनके नाम काट दिए गए। प्रवासी चंद्रकांत बताते हैं कि वो भी अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए उत्साहित हैं। वोटिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेकर मनपसंद सरकार चुन सकते हैं।

छत्तीसगढ़ के छबि बोले- जम्मू में ताउम्र रहना चाहता हूं
छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा के रहने वाले छबि लाल भारद्वाज 33 सालों से जम्मू में हैं। वे बताते हैं कि मैं भी चाहता हूं कि मेरा मान-सम्मान बढ़े, इसलिए जम्मू में ताउम्र रहना चाहता हूं। वह भी अपने परिवार के सदस्यों का वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने को लेकर काफी उत्साहित हैं। वह कहते हैं कि इससे आने वाले समय में राज्य सरकार की सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

जम्मू-कश्मीर में प्रवासियों की सड़क किनारे छोटी-छोटी बस्तियां दिखाई देती हैं। इन बस्तियों को ‘छोटा बिहार’ कहा जाता है।

जम्मू-कश्मीर में प्रवासियों की सड़क किनारे छोटी-छोटी बस्तियां दिखाई देती हैं। इन बस्तियों को ‘छोटा बिहार’ कहा जाता है।

15 लाख प्रवासी 10 या उससे ज्यादा सालों से जम्मू-कश्मीर में रह रहे
जम्मू-कश्मीर की पूरी अर्थव्यवस्था प्रवासी श्रमिकों और पेशेवरों पर निर्भर है। बड़े प्रोजेक्ट फ्लाईओवर, सुरंग, राजमार्ग हो या घर हर प्रोजेक्ट इन्हीं के चलते पूरा हो पा रहा हैं। यह धान के खेतों, सेब के बागों, ईंट भट्‌टा, टेलरिंग का काम करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, राज्य में करीब 15 लाख प्रवासी ऐसे हैं, जो 10 साल या उससे ज्यादा समय यहां रह रहे हैं। छोटी अवधि के लिए आने वाले प्रवासियों की संख्या जोड़ें तो यह संख्या 25 लाख पार कर जाती है।

लोकसभा चुनाव में बाहरी लोग दशकों से वोट कर रहे
कश्मीर घाटी के राजनीतिक दल भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर जम्मू-कश्मीर में सीटें जीतने के लिए ‘गैर-स्थानीय मतदाताओं’ को इंपोर्ट करने का आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाए तो गैर स्थानीय मतदाता लंबे समय से बिना किसी कठिनाई का सामना किए वोट डाल रहे हैं। 2019 में ऐसे 32 हजार वोटर थे।

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