आलिया ने पूछा-लड़कियों को क्यों अंडर-गारमेंट्स छुपाकर रखने पड़ते हैं: एक्ट्रेस बोलीं-‘पीरियड्स न होते तो तुम कहां से आते’, छिपाकर क्यों फेंकें यूज्ड पैड

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21 मिनट पहलेलेखक: दीक्षा प्रियादर्शी

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बॉलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अभद्र टिप्पणी, आपत्तिजनक कमेंट और समाज में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर खुलकर अपने विचार रखें हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को समाज में गलत चीजों का सामना करना पड़ता है और इंडस्ट्री में भी कई मौकों पर सेक्सिज्म होता है। उन्हें इस बात पर बहुत गुस्सा आता है जब महिलाओं को उनकी ब्रा छिपाने के लिए कहा जाता है।

आलिया ने बताया कि कभी-कभी उनके दोस्त पूछते हैं कि उनके साथ क्या गलत हो गया है, वो इतनी आक्रामक क्यों हो गई हैं? क्या तुम्हें पीरियड्स हुए हैं, इतनी संवेदनशील मत बनो। अभिनेत्री ने कहा, “मैं संवेदनशील नहीं हो रही हूं। अगर मुझे पीरियड्स भी आ रहे हैं तो तुम्हें क्या? तुम्हारा जन्म ही इसलिए हुआ, क्योंकि महिलाओं को पीरियड्स आते हैं। मुझे इससे खासी परेशानी होती है जब लोग इस तरह की बातें कहते हैं।

आलिया भट्ट की बात को गौर से समझें तो ये कहा जा सकता है कि हमारे समाज में आज भी ऐसी चीजें देखने को मिलती हैं, जब किसी लड़की के कपड़ों पर पीरियड्स के दाग दिख जाएं तो कहा जाता है कि ‘बड़ी बेशर्म लड़की है’। यहां तक कि लड़कियों की ब्रा, पैंटी, ब्लाउज, पेटीकोट जैसे कपड़ों को लेकर भी समाज की कुछ ऐसी ही मानसिकता है कि इन्हें छिपाकर सुखाने डालना चाहिए। इन कपड़ों को कमरे, बिस्तर, कुर्सी पर बिखेर कर रखने को भी बेशर्मी से जोड़कर देखा जाता है। लड़कों के अंडर गारमेंट्स की बात करें तो उनके लिए समाज में कोई मानक तय नहीं हैं। लड़के आराम से बनियान में घूम सकते हैं, अंडर गारमेंट्स कहीं भी सुखा सकते हैं, कमरे में कहीं भी फैला कर रख सकते हैं। उन्हें शर्म के दायरे में नहीं बांधा जाएगा, न ही कोई सवाल पूछा जाएगा।

आलिया भट्ट का कहना है कि लड़कियों के अंडर-गारमेंट्स को एक टैबू की तरह देखा जाता है।

आलिया भट्ट का कहना है कि लड़कियों के अंडर-गारमेंट्स को एक टैबू की तरह देखा जाता है।

ब्रा या पैंटी पर क्यों किसी की नजर नहीं पड़नी चाहिए

लड़कियों के अंडर गारमेंट्स को लेकर सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर प्रियंका त्यागी ने एक वीडियो बनाया था, जिसमें उन्होंने ये दिखाने की कोशिश की थी कि किस तरह लड़कियां अपनी ब्रा और पैंटी को छुपा कर रखती हैं। अगर गलती से भी पिता, भाई या कोई पुरुष कमरे में आ जाता है, तो ब्रा और पैंटी को छुपा देती हैं या फिर उन पर चादर या कपड़ा डाल देती हैं। छोटे शहरों की महिलाएं भी जब ब्रा, पैंटी या पेटीकोट सुखाने डालती हैं, तो उनके ऊपर कपड़ा डाल देती हैं।

घर के मर्दों से छिपाकर फेंका जाता यूज किया हुआ पैड

ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन की मेंबर श्रेया कपूर ने एक किस्सा शेयर करते हुए बताया- वो और उनकी फ्रेंड मार्केट गए हुई थी। उनकी फ्रेंड को अचानक पीरियड्स आ गए और कपड़े पर दाग लग गया। श्रेया कहती हैं, ‘हमारे पास कुछ ऐसा नहीं था, जिससे दाग को छुपाया जा सके। इतने में एक उम्रदराज अंकल ने मेरी दोस्त को बताया कि उनके कपड़ों पर दाग लगा है। उनकी बात पर मुझे गुस्सा आ गया। मैंने तुरंत उन्हें जवाब दिया, ‘हमें पता है कि दाग लगा है, इस दाग की वजह से ही हम-आप हैं।’ अंकल को हमारी बातें अजीब लगीं। उन्होंने थोड़ी दूर दूसरे व्यक्ति से कहा, ‘बड़ी ही बेशर्म लड़कियां हैं’।

श्रेया आगे कहती हैं, ‘आज भी हमारे घरों या छोटे शहरों में महिलाएं, खासकर लड़कियां यूज किया हुआ पैड फेंकते समय इस बात का ध्यान रखती हैं कि उस पर किसी मर्द की नजर न पड़े। अगर किसी मर्द की नजर पड़ जाए, तो इसे बहुत गलत या शर्मनाक माना जाता है। इसकी वजह से लड़कियों का कॉन्फिडेंस कम हो जाता है।’ अपने स्कूल की बात शेयर करते हुए श्रेया ने बताया कि कई बार लड़के ‘मेंस्ट्रुअल साइकिल’ ‘रिप्रोडक्शन’ जैसे टॉपिक्स की क्लास में हूटिंग करते थे। माहौल ऐसा हो जाता था कि टीचर्स को लड़कियों के लिए अलग से क्लास लेनी पड़ती थी। घर में ही नहीं स्कूल में भी एसी चीजों को टैबू की तरह देखा जाता है।

इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स खुद नहीं खरीद पातीं महिलाएं

साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर बिंदा सिंह का कहना है कि आज के समय में भी ज्यादातर महिलाएं अनसेफ सेक्स के बाद खुद जाकर मेडिकल स्टोर से इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स नहीं खरीद पाती हैं। हमारे समाज में लोगों की साइकोलॉजी यही है कि महिलाएं यदि खुद ऐसी दवाइयां खरीदती हैं तो उन्हें जज किया जाता है। महिलाओं के दिमाग में ये बैठा दिया जाता है कि लोग क्या कहेंगे। लड़की यदि शादीशुदा नहीं है, तब तो इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स खरीदने पर उनके लिए राय बना ली जाती है। लड़कों को लेकर ऐसा कुछ नहीं है। 21-22 साल का लड़का अगर इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स या कंडोम खरीदता है, तो उसके बारे में राय नहीं बनाई जाती।

छोटे शहरों में महिलाएं प्रेग्नेंसी बंप छिपाती हैं

छोटे शहरों में महिलाएं प्रेग्नेंसी के थर्ड ट्राइमेस्टर यानी 8-9 महीने के दौरान बेबी बंप के कारण घर से बाहर निकलने में सहज नहीं हो पातीं। हालांकि कई लोग इसे नजर लगने से भी जोड़कर देखते हैं, मगर असलियत में होता ये है कि महिलाओं के दिमाग में ये भर दिया जाता है कि बेबी बंप दिखाना मतलब शर्म की बात। बेबी बंप के साथ बाहर घूमना सही नहीं होता, लोग देखते हैं, बातें बनाते हैं। पीरियड्स हों या प्रेग्नेंसी, महिलाओं के लिए शारीरिक तकलीफ के साथ-साथ ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता भी बनी रहती है।

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